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एफएक्यू (अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न)

एनईआर के लिए10% जीबीएस

 

के संबंध में

 

अकसर पूछे जाने वाले प्रश्न

 

 

1. केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा वार्षिक बजट का 10% अलग करने की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति क्या है?
2. किसी मंत्रालय/विभाग को पूर्वोत्तर के लिए आबंटन निकालने से छूट देने का आधार क्या है?
3. गैर-छूट प्राप्त मंत्रालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए 10% अलग रखे गए परिव्यय की गणना किस प्रकार की जाती है ?
4. अव्यपगत केंद्रीय संसाधन पूल (एनएलसीपीआर) में निधियां किस प्रकार आती है?
5. एनएलसीपीआर से जुड़े लेखों का रख-रखाव कहां किया जाता है और 'पूल'/निधि की प्रबंधन संरचना क्या है?
6. क्या एनएलसीपीआर में जमा राशि डोनर मंत्रालय के पास आबंटन/व्यय के लिए उपलब्ध है?
7. डोनर मंत्रालय संपूर्ण/आंशिक पूल के लिए अपनी वार्षिक आवश्यकता किस प्रकार प्रक्षेपित करता है?
8. यदि एनएलसीपीआर पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अति आवश्यक है, तो डोनर मंत्रालय ने निधि की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं ?
9. एनएलसीपीआर स्कीम के उद्देश्य क्या हैं?
10. एनएलसीपीआर स्कीम के प्रशासन के लिए दिशा-निर्देश ।
11. 11वीं योजना (2007-08, 2008-09 और 2009-10 ) के दौरान गैर-छूट प्राप्त मंत्रालयों द्वारा एनईआर के लिए रखी गई निधियों के सापेक्ष आबंटन/व्यय- कुछ मंत्रालयों द्वारा उपयोग में कमी ।
12. कुछ लाइन मंत्रालयों की स्कीमों के एनईआर में चालू न हो पाने के क्या कारण हैं?
13. लाइन मंत्रालयों द्वारा एनईआर में निधियों के उपयोग को बढ़ाने के लिए डोनर मंत्रालय के पहल ।
14. क्या छूट प्राप्त विभाग/स्कीम को एनईआर के लिए निधियों को अलग करने के लिए मंत्रालयों/विभागों की मांगों की निरंतर समीक्षा के लिए कोई प्रक्रिया है ?

 

(उत्तर के लिए कृपया स्क्रॉल डाउन करें)

 


 

 

प्रश्न 1. केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा वार्षिक बजट का 10% अलग करने की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति क्या है?

 

 

उत्तर. स्मरण किया जाए कि अक्तूबर 1996 में केंद्र सरकार की 'पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए नई पहल' की घोषणा में पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास से संबंधित कई उपायों को शामिल किया गया था । इनमें से एक पूर्वोत्तर राज्यों के विकास के लिए केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों की योजना बजट का कम से कम 10% अलग रखना था । योजना आयोग द्वारा विभिन्न मंत्रालयों/विभागों के साथ किए गए प्रारंभिक पारस्परिक क्रियाकलाप से यह बात सामने आई कि वर्ष 1997-98 के दौरान कुछ केंद्रीय मंत्रालयों द्वारा पूर्वोत्तर पर व्यय उस वर्ष के लिए निर्धारित 10% के जीबीएस से कम रहा । इसके बाद योजना आयोग ने पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए 10% की खर्च न की गई निर्धारित राशि में से केंद्रीय संसाधन पूल बनाने की संभावना का पता लगाया ताकि पूर्वोत्तर में अवसंरचनात्मक विकास परियोजनाओं को सहायता दी जा सके ।

 

1998–1999 से भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभाग (विशेष रूप से छूट प्राप्त कुछ मंत्रालयों/विभागों को छोड़कर) अपने वार्षिक बजट, बाह्य सहायता प्राप्त स्कीमों के लिए कम आबंटन और पूर्वोत्तर क्षेत्र में व्यय के लिए स्थानीय या कार्यक्रम विशिष्ट स्कीम/परियोजनाओं का कम से कम 10% अलग रख रहे हैं । वर्तमान में 52 गैर-छूट प्राप्त मंत्रालय/विभाग (रेलवे मंत्रालय और हाल ही में सृजित फार्मास्युटिकल्स विभाग सहित) हैं जो एनईआर के लिए निधियां निकाल रहे हैं ।

 

गैर-छूट प्राप्त मंत्रालयों द्वारा निकाली गई राशियों में से उपयोग नहीं किए जा सके हिस्से को प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में अव्यपगत संसाधन पूल में सरेंडर कर दिया जाता है जिसका रख-रखाव प्रोफार्मा आधार पर किया जाता है ।

 

 

प्रश्न 2. किसी मंत्रालय/विभाग को पूर्वोत्तर के लिए आबंटन निकालने से छूट देने का आधार क्या है ?

 

उत्तर. एनईआर के लिए 10 % की नेट बजटीय सहायता को अलग रखना अधिकतर मंत्रालयों/विभागों के लिए आवश्यक है, कुछ केंद्रीय मंत्रालयों/विभागों को इससे छूट प्राप्त है ।

 

         मंत्रालयों/विभागों को छूट देने के लिए अनुसरण किए जाने वाले मानदंड इस प्रकार हैः

 

  1. पूर्वोत्तर में कार्य की लगभग न के बराबर संभावना रखने वाले बेहद वैज्ञानिक मंत्रालय/विभाग
  2. महासागरीय विकास विभाग जैसे पूर्व के मंत्रालय/विभाग जिनका पूर्वोत्तर और सिक्किम से सीधा कोई लेना देना नहीं है;
  3. वे मंत्रालय जिनका विगत तीन वर्षों के दौरान पूर्वोत्तर और सिक्किम में व्यय 'शून्य' था और
  4. वे मंत्रालय/विभाग जिनका सकल बजटीय सहायता 10 करोड़ रु. से कम है ।

 

पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए बजट प्राक्कलन (बीई 2010-11) में पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए निधि अलग रखने से छूट प्राप्त मंत्रालयों/विभागों के नाम इस प्रकार हैं:

  1. परमाणु ऊर्जा
  2. कंपनी मामले
  3. आर्थिक मामले
  4. व्यय
  5. विदेश मंत्रालय
  6. विधि मामले
  7. भू-विज्ञान
  8. राजभाषा
  9. कार्मिक और प्रशिक्षण
  10. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
  11. योजना
  12. राजस्व
  13. सामाजिक न्याय और अधिकारिता *
  14. इस्पात
  15. अंतरिक्ष
  16. विज्ञान और प्रौद्योगिकी
  17. वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान

* अनुसूचित जाति प्रभाग (एससीडी) के लिए निधियों का केवल 2% ही एनईआर को आबंटित किया जाता है । एससीडी से इतर क्षेत्रों के लिए 10% आबंटन का मानक लागू है ।

 

 

प्रश्न 3. गैर-छूट प्राप्त मंत्रालय के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए 10% अलग रखे गए परिव्यय की गणना किस प्रकार की जाती है ?

 

उत्तर. भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/विभाग अपने वार्षिक बजट, बाह्य सहायता प्राप्त स्कीमों के लिए कम आबंटन और पूर्वोत्तर क्षेत्र में व्यय के लिए स्थानीय या कार्यक्रम विशिष्ट स्कीम/परियोजनाओं का कम से कम 10% अलग रखते हैं ।

 

गैर-छूट प्राप्त मंत्रालयों द्वारा निकाली गई राशियों में से उपयोग नहीं किए जा सके हिस्से को प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में अव्यपगत संसाधन पूल में सरेंडर कर दिया जाता है जिसका रख-रखाव प्रोफार्मा आधार पर किया जाता है ।

         

गैर-छूट प्राप्त मंत्रालयों के लिए प्रत्येक वित्तीय वर्ष के अंत में एनएलसीपीआर को व्यय/सरेंडर का ब्यौरा देने के लिए फार्मेट इस प्रकार है:

 

क. सं.प्रा. (ईएपी का निवल + स्थानीय /कार्यक्रम विशिष्ट, यदि कोई हो)

 

ख. पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए निधि अलग करना (कम से कम क का 10%)

 

ग. ख में से वास्तविक व्यय

 

घ. एनएलसीपीआर में स्थानांतरित करने के लिए निश्चित राशि ख –ग है (यदि ख >ग से).

 

 

निधि अलग करने के लिए संख्यात्मक उदाहरण

 

क. जीबीएस (सं.प्रा.) = 100 रु.
     जिसमें

 

     (i)  ईएपी = 5 रु.

     (ii) स्थानीय / कार्यक्रम विशिष्ट = 2 रु.

           निधि अलग करने के लिए पात्र जीबीएस = 93 रु.

                         [अर्थात 100 – 5 – 2]

 

ख. एनईआर के लिए निधि अलग करना = 9.3 [93 का10%]

 

ग. व्यय = 8 रु.

                  

घ. एनएलसीपीआर में स्थानांतरित करने के लिए निश्चित राशि = 1.3 रु.

                  [अर्थात 9.3 – 8]

 

 

प्रश्न 4. अव्यपगत केंद्रीय संसाधन पूल (एनएलसीपीआर) में निधियां किस प्रकार आती है?

 

उत्तर. वह राशि जिसके द्वारा किसी मंत्रालय/विभाग का वास्तविक व्यय संशोधित प्राक्कलन स्तर पर अलग किए गए परिव्यय से कम रह जाता है, उस राशि को वित्त वर्ष के अंत में वित्त मंत्रालय को सरेंडर कर दिया जाता है । सरेंडर की गई यह राशि अव्यपगत होती है लेकिन यह एनएलसीपीआर पूल में चली जाती है ।

 

         

प्रश्न 5. एनएलसीपीआर से जुड़े लेखों का रख-रखाव कहां किया जाता है और 'पूल'/ निधि की प्रबंधन संरचना क्या है?

 

उत्तर. एनएलसीपीआर से जुड़े लेखों का रख-रखाव भारत सरकार के लोक लेखा में रिजर्व निधि के रूप में किया जाता है । इस पूल/निधि का रख-रखाव वित्त मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा किया जाता है ।

 

 

प्रश्न 6. क्या एनएलसीपीआर में जमा राशि डोनर मंत्रालय के पास आबंटन/व्यय के लिए उपलब्ध है?

 

Ans.   नहीं !

 

          डोनर मंत्रालय एनएलसीपीआर नामक योजना स्कीम एनएलसीपीआर पूल से जुड़ा हुआ है । लेकिन एनएलसीपीआर स्कीम के लिए निधि का वार्षिक आबंटन सामान्य बजटीय प्रक्रिया के जरिए किया जाता है और इसे एनएलसीपीआर पूल में संग्रहित राशि के साथ परस्पर जोड़ा नहीं जाता है ।

 

 

प्रश्न 7. डोनर मंत्रालय संपूर्ण/आंशिक पूल के लिए अपनी वार्षिक आवश्यकता किस प्रकार प्रक्षेपित करता है?

 

उत्तर. एनएलसीपीआर के तहत वार्षिक आवश्यकता को संस्वीकृत परियोजनाओं पर समर्पित देयताओं की राशि और संस्वीकृति के लिए विभिन्न स्तरों पर विचाराधीन नई परियोजनाओं को ध्यान में रखकर प्रक्षेपित किया जाता है ।

 

 

प्रश्न 8. यदि एनएलसीपीआर पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अति आवश्यक है, तो डोनर मंत्रालय ने निधि की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?

 

उत्तरः डोनर मंत्रालय प्रत्येक वित्त वर्ष संबंधित प्रत्येक गैर-छूट प्राप्त मंत्रालय/विभाग से एनई राज्यों के लिए आबंटन में से सरेंडर की गई राशि नियमित रूप से संग्रहित करता है । प्रत्येक मंत्रालय/विभाग से प्राप्त सूचनाओं को संकलित किया जाता है और सहमति के लिए इसे वार्षिक रूप से वित्त मंत्रालय को भेज दिया जाता है । इसके अलावा डोनर मंत्रालय इस पूल में आने वाले वार्षिक संचयी राशि और एनएलसीपीआर स्कीम के तहत खर्च की गई राशि का रिकार्ड रखता है ताकि एनएलसीपीआर पूल में निवल संग्रहन को निरंतर ट्रैक किया जा सके ।

 

एनएलसीपीआर स्कीम के तहत डोनर मंत्रालय से प्राप्त वार्षिक आबंटन इस पूल में निवल संचयी प्रोद्भवन के आधार पर तय नहीं किया जाता बल्कि यह भारत सरकार के सामान्य बजटीय प्रक्रिया के माध्यम से निर्धारित किया जाता है ।

 

 

प्रश्न 9. एनएलसीपीआर स्कीम के उद्देश्य क्या हैं?

 

उत्तरः एनएलसीपीआर स्कीम का व्यापक उद्देश्य नई अवसंरचनात्मक परियोजनाओं/स्कीमों के लिए बजटीय वित्तपोषण के प्रवाह को बढ़ाकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में अवसंरचनात्मक विकास की गति को सुनिश्चित करना है । आर्थिक और सामाजिक दोनों ही अवसंरचनात्मक क्षेत्रों जैसे विद्युत, सड़क और पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति, खेलकूद आदि को केंद्रीय पूल के तहत सहायता प्रदान करने के लिए विचार किया जाता है ।

 

केंद्रीय पूल की निधियों को केंद्रीय और राज्य क्षेत्र की परियोजनाओं/स्कीमों के लिए जारी किया जा सकता है तथापि, इस पूल के तहत उपलब्ध निधियां राज्य सरकारों या केंद्र सरकारों/विभागों/एजेंसियों की सामान्य योजना कार्यक्रमों के साथ जोड़ने के लिए नहीं है ।

 

 

प्रश्न 10. प्रशासन के लिए एनएलसीपीआर स्कीम के दिशा-निर्देश ।

 

उत्तरः विभाग के पास एनएलसीपीआर के प्रशासन के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश मौजूद हैं । तत्संबंधी पहला दिशा-निर्देश नवंबर, 2001 में जारी किए गए थे । संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए पूर्व के अनुभवों के आधार पर इसमें 26.02.2007 और 19.08.2008 में संशोधन किए गए । इसमें पूर्वोत्तर राज्यों के पिछड़े क्षेत्रों में 25 प्रतिशत एनएलसीपीआर संसाधन के आबंटन का प्रावधान है । दिशा-निर्देशों को बाद में 06.08.2009 को संशोधित किया गया था ।

 

इसे और अधिक कारगर बनाने के लिए दिनांक 06.08.2009 के अद्यतन संशोधन में प्रावधान शामिल किए गए ।

 

इसे और अधिक कारगर तथा सरल बनाने के लिए दिनांक 06.08.2009 के अद्यतन संशोधन में निम्नलिखित प्रावधान शामिल किए गएः

 

  • राज्य सरकारों को प्रत्येक वर्ष 30 नवंबर को दृष्टिकोण पत्र के साथ वार्षिक प्राथमिकता सूची सौंपनी होगी ।
  • परियोजनाओं का प्रतिधारण महीने भर की समय सीमा में पूर्ण करना ।
  • राज्य सरकारों को प्रतिधारण के दो माह के भीतर प्रतिधारित परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) सौंपनी होगी ।
  • डीपीआर की जांच पूरी करनी होगी और परियोजनाओं को डीपीआर के पूर्ण होने के दो माह के भीतर संस्वीकृत करनी होगी ।
  • राज्य सरकारों को परियोजना की संस्वीकृति के तीन महीनों के भीतर टेंडर के द्वारा कार्य सौंपना होगा ।
  • संस्वीकृत परियोजनाओं में निधियां 40%, 40% और 20% की तीन किस्तों में जारी की जाएगी ।
  • निधियों को उन्हें जारी किए जाने के 12 महीने के भीतर उपयोग करना होगा ।
  • राज्य सरकारों को निधियां इसके जारी होने के पन्द्रह दिनों के भीतर क्रियान्वयन एजेंसियों को सौंपनी होगी ।
  • राज्य सरकारों को परियोजना लक्षित तिथि (जैसा राज्य सरकार के डीपीआर में वर्णित हो) के अलावा छह महीने की समय सीमा के भीतर पूरी करनी होगी अन्यथा डोनर मंत्रालय की ओर से वित्तपोषण बंद कर दिया जाएगा । परियोजना के शेष बचे कार्य को अपने संसाधनों के जरिए पूरी करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी ।
  • यदि परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान राज्य सरकार परियोजना को पूर्ण करने के कार्यक्रम को बढ़ाना/परिवर्तित करना चाहती है तो यह बैठक आयोजित करके राज्य के मुख्य सचिव के स्तर पर यह किया जा सकता है और इस प्रकार तय की गई संशोधित तारीख के बारे में डोनर मंत्रालय को तत्संबंधी विशिष्ट कारणों का उल्लेख करते हुए परियोजना पूर्ण करने की मूल/वास्तविक तिथि के बाद छह महीने की अवधि समाप्त होने से पहले अवगत कराना होगा ।

 

 

प्रश्न 11. 11वीं योजना (2007-08, 2008-09 और 2009-10) के दौरान गैर-छूट प्राप्त मंत्रालयों द्वारा एनईआर के लिए रखी गई निधियों के सापेक्ष आबंटन/व्यय– कुछ मंत्रालयों द्वारा उपयोग में कमी ।

 

उत्तरः 11वीं योजना (2007-08, 2008-09 और 2009-10) के दौरान गैर-छूट प्राप्त मंत्रालयों द्वारा एनईआर के लिए रखी गई निधियों के सापेक्ष आबंटन/व्यय को नीचे सारणी में देखा जा सकता हैः (विवरण अनुबंध-I, II और III में दिया गया है)) – 28/04/2010 को । .

                                                                                                                                                                                  रु. करोड़ में

सं.प्रा.2007-08 व्यय 2007-08 सं.प्रा.2008-09 व्यय 2008-09 सं.प्रा.2009-10*
12968.38 11048.07 14752.45 12406.60 17235.16

 

*वर्ष 2009-10 में एनईआर के लिए कुल आबंटन में इस वर्ष के दौरान एनईआर में रेलवे बोर्ड द्वारा दर्ज 1870 करोड़ रु. का व्यय शामिल है ।

 

उपर्युक्त सारणी और अनुबंध I और II में दर्शाए गए व्यय के ब्यौरों में कुछ विभागों द्वारा एनईआर की निधियों के उपयोग में कमी दिखाई गई है । खर्च न की गई राशि को एनएलसीपीआर पूल में सरेंडर कर दिया जाता है ।

 

मंत्रालयों/विभागों द्वारा निधि के कम उपयोग के बारे में बताया गया प्रमुख कारण पूर्वोत्तर के राज्य सरकारों से प्रस्तावों और उपयोग प्रमाण पत्र का प्राप्त न होना है । निधियों का कम उपयोग पूर्वोत्तर राज्यों में केंद्रीय लाइन मंत्रालयों की स्कीमों के उपेष्टतम क्रियान्वयन को दर्शाता है ।

 

 

प्रश्न12. एनईआर में कुछ लाइन मंत्रालयों की स्कीमों के चालू न हो पाने के क्या कारण हैं?

 

उत्तर. एनईआर में कुछ लाइन मंत्रालयों की स्कीमों के चालू न हो पाने का कारण राज्य और केंद्र दोनों ही स्तरों पर अक्षमता है :

 

  1. राज्य सरकारों की अक्षमता –
    • लाइन मंत्रालयों की स्कीमों के बारे में जानकारी का अभाव ।
    • निधीयन के विभिन्न स्रोतों अर्थात एसीए, एनएलसीपीआर, एनईसी, बीआरजीएफ, केंद्रीय लाइन मंत्रालय आदि के बारे में जानकारी का अभाव जहां पहुंचा जा सकता है।
    • राज्यों के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र में स्कीमों के लिए डीपीआर तैयार करने में क्षमता का अभाव ।
    • भारत सरकार और अन्य स्रोतों से निधियों तक पहुंच बनाने के लिए आवश्यक प्रक्रियात्मक जानकारी का अभाव जिसके कारण प्रस्ताव और उपयोग प्रमाणपत्र विलंब से प्रस्तुत किए जाते हैं ।
    • पूर्वोत्तर की राज्य सरकारों द्वारा लागत मानक वास्तविक नहीं प्रतीत होते हैं ।

 

  1. राज्य सरकारों की अक्षमता-
    1. डोनर मंत्रालय के भीतर कार्यक्षेत्र संबंधी जानकारी /पूर्ण जानकारी का अभाव है जिससे हम डीपीआर की जांच करने में पूर्णतः सक्षम नहीं होते ।
    2. स्कीमों के उपयुक्त निरूपण का अभाव : चूंकि एकल कार्यक्रम/क्षेत्र के लिए निधीयन के कई स्रोत हैं इसलिए निधीयन की ओवरलैपिंग से बचने के लिए स्कीमों को निरूपित किया जाना चाहिए । उदाहरण के लिए ग्रामीण सड़क पीएमजीएसवाई द्वारा, दो लेन राजमार्ग एसएसआरडीपी-एनई (डॉर्थ) के तहत, छोटे राज्य विशिष्ट सड़कें एनएलसीपीआर के तहत वित्तपोषित हैं आदि ।
    3. सड़कों की वित्तीय सीमा को भी विनिर्दिष्ट किया जा सकता है । उदाहरण के लिए 100 करोड़ रु. तक की सड़कों को राज्य पीडब्ल्यूडी, बीआरओ, एनएलसीपीआर से वित्तपोषित किया जाएगा । अधिक व्यय वाले दो लेन के राजमार्गों में एनएचएआई/डॉर्थ के तहत शुरू किया जाना चाहिए ।

 

  1. तीन स्तरों पर योग्यता का अभाव: (क) विभागीय – डोनर मंत्रालय (ख) राज्य सरकार (लाइन विभाग) (ग) केंद्र सरकार के विभिन्न लाइन मंत्रालयों के (घ) स्कीमों/परियोजनाओं की पहचान, निर्माण और कार्यान्वयन में अपर्याप्त सामाजिक भागीदारी (ड.) आसानी से समझी जाने वाली सूचनाओं का सरकार द्वारा अपर्याप्त प्रचार-प्रसार ।

 

 

प्रश्न 13. लाइन मंत्रालयों द्वारा एनईआर में निधियों के उपयोग को बढ़ाने के लिए डोनर मंत्रालय की पहल ।

 

उत्तर . डोनर मंत्रालय ने उन चुनिंदा मंत्रालयों/विभागों की योजना स्कीमों की समीक्षा की पहल की है जिनमें एनईआर के लिए संभावनाएं मौजूद हैं । ये मंत्रालय/विभाग हैः

 

  • कृषि और सहकारिता विभाग
  • पशुपालन और डेयरी विभाग
  • पर्यटन मंत्रालय
  • खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय
  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय
  • वस्त मंत्रालय
  • स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग

 

इस प्रयोजन के लिए सचिव, डोनर की अध्यक्षता में एक अंतर मंत्रालयी समूह गठित किया गया है ।

 

 

प्रश्न14. क्या छूट प्राप्त विभाग/स्कीम को एनईआर के लिए निधियों को अलग करने के लिए मंत्रालयों/विभागों की मांगों की निरंतर समीक्षा के लिए कोई प्रक्रिया है?

 

उत्तर. जी, हां । पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए निधि अलग करने से विभाग/स्कीम को छूट देने के संबंध में मंत्रालयों/विभागों के अनुरोध की प्रतिक्रिया में डोनर मंत्रालय व्यापक आधार वाली स्कीम/उप-स्कीम तैयार करने की वकालत करता है ताकि पूर्वोत्तर राज्यों में यह कार्यान्वयन अनुकूल हो सके ।

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श्रीमती. कीर्ति सक्सेना, आर्थिक सलाहकार

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