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एनईआर में अंतर्देशीय जलमार्ग

 

 

 

परिचय

 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

 

पूर्वोत्तर भारत में कई छोटी-बड़ी नदियां हैं जो विशेषकर अपने मैदानी भागों में जलीय यातायात संबंधी सुविधाएं प्रदान करती हैं । प्राचीन काल से लेकर सड़कों के निर्माण होने तक ब्रह्मपुत्र नदियां सामान्य तौर पर यातायात के माध्यम के रूप में इस्तेमाल की जाती थी । अंग्रेजी शासन के दौरान पूर्वोत्तर भारत और कलकत्ता (अब कोलकाता) के बंदरगाहों के बीच यातायात और व्यापार के लिए ब्रह्मपुत्र और बराक-सुरमा नदियों का उपयोग व्यापक रूप से किया जाता था । चाय उद्योग के विकास के साथ ये नदियां व्यापार की प्रमुख वाहक बन गईं । ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1844 में कोलकाता से डिब्रूगढ़ के जलीय मार्ग का आरंभ किया और 1847 में ज्वाइंट स्टीमर कंपनी द्वारा इस मार्ग पर स्टीमशिप उतारा गया । लगभग इसी समय बराक-सुरमा-मेघना नौचालन चैनल के माध्यम से सिलचर को कोलकाता से जोड़ा गया । तथापि, 1947 में देश के विभाजन के बाद पूर्वोत्तर भारत और कोलकाता तट के बीच एक अन्य देश के जन्म के बाद इस जलीय यातायात व्यवस्था को गंभीर झटका लगा ।

 

नदियों के नेटवर्क

 

2. अनुमान है कि पूर्वोत्तर क्षेत्र में लगभग 1800 किमी. का नदी मार्ग मौजूद है । जिसका इस्तेमाल स्टीमरों और बड़ी देशी नावों द्वारा किया जा सकता है । राज्य और केंद्र दोनों ही सरकारों के अंतर्देशीय जल यातायात विभाग इस क्षेत्र में जलीय यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाने का प्रयास करते रहे हैं । वर्तमान में ब्रह्मपुत्र में कई लघु नदीय संपर्क स्थल मौजूद हैं । इसके अलावा इसमें 30 जोड़े से अधिक फेरी घाट (क्रॉसिंग प्वाइंट) हैं जो यात्रियों और कार्गो की आवाजाही के लिए उपयोग में लाए जाते हैं । करीमगंज, बदरपुर और सिलचर में बराक नदी में भी लघु संपर्क स्थल और कई स्थानों पर आरपार आने जाने के लिए फेरी सेवाएं उपलब्ध हैं ।

 

3. अरुणाचल प्रदेश में लोहित, सुबनसिरी, बुढ़ी दिहिंग, नवा दिहिंग, और तिरप में उन स्ट्रेचों में छोटी देशी नौकाओं द्वारा नौचालन के लिए उपयोग में लाई जाती हैं जहां त्वरित जलीय यातायात के साधन नहीं हैं । मिजोरम में धालेश्वरी, सोनाई, तुइलियानपुई और चिमतुइपुइ का भी उपयोग सुलभ स्ट्रेचों पर छोटी देशी नौकाओं द्वारा किया जाता है । उसी प्रकार मणिपुर में मणिपुर नदी और उसकी तीन सहायक नदियों इरील, इंफाल और थाउबल का उपयोग छोटी नावों द्वारा छोटे-मोटे सामानों की आवाजाही के लिए किया जाता है।

 

कार्गो के लिए संभावनाएं

 

4. पूर्वोत्तर क्षेत्र में सर्वाधिक व्यापक प्रत्याशित कार्गो संबंधी आवाजाही विशेषकर अरुणाचल प्रदेश में ब्रह्मपुत्र की विभिन्न सहायक नदियों पर राष्ट्रीय पनबिजली विद्युत निगम लि. (एनएचपीसी), पूर्वोत्तर विद्युत पावर निगम लि. (नेपको), राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) के अलावा विभिन्न निजी क्षेत्र की कंपनियों द्वारा क्रियान्वित की जा रही महत्वाकांक्षी विद्युत परियोजनाओं से निकलेगी । इन घटनाक्रमों से 20 वर्षों में करीब 50-100 मिलियन मीट्रिक टन (2.5-5.0 मीट्रिक टन प्रतिवर्ष) कार्गो आवाजाही सृजित होने की आशा है । तद्नुसार इसके लिए आवश्यक अवसंरचना आकार में बहुत व्यापक होगा । ऐसी व्यापक आवश्यकताओं की जरूरतों को पूरा करने में आईडब्ल्यूटी सर्वाधिक पूरक भूमिका निभा सकता है ।

 

5. पहचान किए गए अन्य कार्गो आवाजाही में मेघालय से कोयला, फरक्का से पूर्वोत्तर के विभिन्न गंतव्यों तक फ्लाई ऐश, सीमेंट संयंत्रों के लिए चूना पत्थर, नुमालिगढ़ रिफाइनरी से पेट्रोलियम उत्पाद, हल्दिया से बिटुमन, भारतीय खाद्य निगम लि. के लिए कोलकाता से पूर्वोत्तर के विभिन्न गंतव्यों तक के खाद्यान शामिल हैं ।

 

राष्ट्रीय जलमार्ग- II के रूप में ब्रह्मपुत्र

 

6. ब्रह्मपुत्र नदी पूर्वोत्तर क्षेत्र की जीवन-रेखा है । 1988 में धुबरी से सादिया तक 891 किमी. की दूरी को राष्ट्रीय जलमार्ग-2 (एनडब्ल्यू-2) घोषित किया गया था । भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण डिब्रूगढ़ तक एनडब्ल्यू-2 पर कम से कम 45 मीटर चौड़े और 2 मीटर गहरे नौचालन चैनल की देखरेख करता है । 24 घंटे नौचालन को सुकर बनाने के लिए धुबरी से सिलघाट तक आवश्यक सहायता बनाए रखा जाता है जबकि दिवस नौचालन नदी के अगले ऊपरी हिस्से में प्रदान किया जाता है । धुबरी, जोगीघोपा, पांडु, सिलघाट, निमाती और डिब्रूगढ़ जैसे सामरिक स्थलों पर कार्गो के चढ़ाने और उतारने की टर्मिनल सुविधाओं का रख-रखाव आईडब्ल्यूएआई द्वारा किया जा रहा है । पांडु (गुवाहाटी) को बहु मॉडलीय यातायात केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है जो संपूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र की सेवा कर सकेगा । धुबरी, असम में लगभग 40.81 लाख रु. की लागत से सर्वसुविधा संपन्न स्थायी टर्मिनल का निर्माण किया जाएगा । धुबरी ब्रह्मपुत्र नदी पर पहला बड़ा टर्मिनल है । जोगीघोपा में मौजूदा अस्थायी आईडब्ल्यूटी को टर्मिनल तक रेल से जोड़कर मेघालय के कोयले जैसे उत्पादों के लिए व्यापक कार्गो हैंडलिंग टर्मिनल के रूप में संवर्द्धित किया जाएगा।

 

 

बराक नदी की राष्ट्रीय जलमार्ग के रूप में घोषणा

 

7. संसद द्वारा विधेयक पारित करके असम में भंगा और लखिपुर के बीच बराक नदी (121 किमी.) को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित कर दिया जाएगा ।

 

मुद्दे

 

8. पूर्वोत्तर क्षेत्र में नदियों की बहुलता है इसलिए यह अंतर्देशीय जलीय यातायात के विकास के लिए व्यापक संभावना रखता है । आईडब्ल्यूटी यातायात नियोजन, निधि आबंटन और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नीतिगत प्राथमिकता में उचित महत्व प्राप्त नहीं कर पाया है ।

 

9. आईडब्ल्यूटी क्यों पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए अनुकूल है? यातायात संबंधी विकल्प के रूप में आईडब्ल्यूटी की व्यवहार्यता को निम्नलिखित मुद्दों के साथ संवर्द्धित किया जा सकता है:

  1. आईडब्ल्यूटी के लिए योजना और निवेश को बहु मॉडलीय यातायात योजना के भीतर स्थापित करना है । पूर्वोत्तर क्षेत्र  में बहु मॉडलीय यातायात नियोजन अभी आरंभ होना है, इसलिए आईडब्ल्यूटी की संपूर्ण संभावनाओं का दोहन नहीं किया जा सका है ।
  2. निम्न लागत, उच्च मात्रा, निम्न ईंधन व्यय और पूर्वोत्तर क्षेत्र और देश के शेष भाग के बीच लघुतम सड़क की दूरी की दृष्टि से नीति निर्माताओं और प्रयोगकर्ताओं के बीच आईडब्ल्यूटी के लाभों का प्रचार-प्रसार किया जाना है । 
  3. स्वतंत्रता से पूर्व अविभाजित बंगाल और पूर्वोत्तर क्षेत्र एकीकृत आर्थिक बाजार थे जहां कार्गो और यात्रियों की आवाजाही के लिए नदीय यातायात का व्यापक इस्तेमाल किया जाता था । निवेश और बहु मॉडलीय नियोजन दोनों ही के जरिए उन मार्गों को पुनः सृजित करना मौजूदा चुनौती है । 
  4. आईडब्ल्यूटी स्वाभाविक रूप से बड़े परिमाण में उन मालों के लिए अनुकूल है जिनका शेष भारत से पूर्वोत्तर क्षेत्र में आयात और निर्यात करता है । चाय, तेल, सीमेंट और कोयले का निर्यात किया जाता है । खाद्यान्न, रासायनिक खाद, पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए जाते हैं । ये सभी सामान नष्ट होने वाली वस्तु नहीं है और भारी मात्रा में आती जाती है इसलिए ये आईडब्ल्यूटी के द्वारा यातायात के लिए उपयुक्त है। यह सड़क और रेल की तुलना में सस्ता तो होगा पर अपेक्षाकृत द्रुतगामी नहीं होगा ।  
  5. जलमार्गों पर निवेश से नागालैंड और मणिपुर को व्यापक कार्गो की आवाजाही के लिए वैकल्पिक मार्ग प्रदान कर सकता है जो यातायात का अपेक्षाकृत सस्ता विकल्प होगा और इसे किसी प्रकार के प्रतिबंध और इस प्रकार की किसी अन्य आकस्मिकताओं का सामना नहीं करना पड़ेगा ।
  6. तथापि, आईडब्ल्यूटी किसी गंभीर घटनाक्रम के लिए बंग्लादेश द्वारा सक्रिय और सकारात्मक भागीदारी जरूरी है । अतः  आईडब्ल्यूटी व्यवस्थाओं पर इस प्रकार योजना बनानी होगी कि भारत और बंग्लादेश दोनों ही के पणधारियों को आईडब्ल्यूटी के विकास और उपयोग से मूल्य प्राप्त हो ।  
  7. भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण को धुबरी और सादिया के बीच ब्रह्मपुत्र के राष्ट्रीय जलमार्ग-2 (एनडब्ल्यू-2) को विकसित करने और उसके रख-रखाव का अधिदेश प्राप्त है । पूर्वोत्तर क्षेत्र में अब अपेक्षाकृत बेहतर टर्मिनल मौजूद हैं । एनडब्ल्यू-2 के लिए और अधिक निवेश विचाराधीन है । आईडब्ल्यूएआई भी बराक नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग-6 घोषित करने के लिए काम कर रहा है । इसके निकट भविष्य में जल्द ही घोषित कर दिए जाने की आशा है । बराक में भी अच्छे विकसित टर्मिनल हैं । इसलिए राष्ट्रीय जलमार्ग-2 और राष्ट्रीय जलमार्ग-6 (प्रस्तावित) पर आईडब्ल्यूटी की अवसंरचना विकसित करने के लिए निवेश में कोई गंभीर गत्यवरोध उत्पन्न नहीं है । 
  8. निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों ही क्षेत्रों से वांछित आकार के जहाजी बेड़ा प्रचालकों के सामने न आने के कारण आईडब्ल्यूटी को नीति और निवेश में अब तक इसका उचित महत्व प्राप्त नहीं हो सका है । यह आईडब्ल्यूटी के प्रोत्साहन में सबसे बड़ा गत्यवरोध है । यातायात प्रयोजनों के लिए ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों का वाणिज्यिक तौर पर पूर्ण दोहन नहीं हो सका है । आईडब्ल्यूएआई कोई प्रचालक नहीं है । सार्वजनिक क्षेत्र, केंद्रीय अंतर्देशीय जल-परिवहन निगम लि. (सीआईडब्ल्यूटीसी) रुग्ण है । भारत या बंग्लादेश के निजी क्षेत्र विभिन्न नीतिगत कारणों से सामने नहीं आए हैं । अतः यहां चुनौती नीतिगत क्षेत्र सृजित करने की है जो निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों दोनों ही में उपयुक्त जहाजी बेड़ों में निवेश को प्रोत्साहित कर सके । 
  9. आईडब्ल्यूटी का ईष्टतम विकास तभी हो सकेगा जब इनके बीच ये प्रयोजन पूरे होंगे:

     

    • जलमार्गों पर अवसंरचना सृजन के लिए आईडब्ल्यूएआई
    • भारतीय खाद्य निगम और तेल कंपनियां, चाय उद्योग, सीमेंट उद्योग जैसे पणधारी
    • उचित आकार के जहाजी बेड़ों के स्वामी
    • बंग्लादेश की साख और उनकी भागीदारी
    • बहु मॉडलीय परिवहन योजना
  10. बड़ी मात्रा में सामानों के यातायात के लिए आईडब्ल्यूटी के ईष्टतम उपयोग से द्रुतगामी रेल संपर्क, विद्युत उत्सर्जन, दूरसंचार लिंकों आदि के माध्यम से यात्रियों की आवाजाही के लिए पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ने वाले संकीर्ण चिकेन नेक कोरिडोर खुल जाएगा ।
  11. पर्यटन भी आईडब्ल्यूटी का क्षमतावान उपयोगकर्ता है ।
  12. पूर्वोत्तर में जल विद्युत विकास के लिए ओवर डाइमेंशनल कार्गो (ओडीसी) के परिवहन के लिए आईडब्ल्यूटी बेहद जरूरी है क्योंकि पहाड़ी सड़कों की सीमाएं हैं ।

 

 

पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए आईडब्ल्यूटी मास्टर प्लान

 

 

आईडब्ल्यूएआई के क्रियाकलाप

 

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श्री उदय शंकर, निदेशक

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